जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने कहा— ‘बुलडोजर कार्रवाई अंतिम विकल्प नहीं’; छात्रों के भविष्य और कानूनी विकल्पों पर विचार करने की अपील
नई दिल्ली/रामपुर (दैनिक वायरल न्यूज लाइव ब्यूरो): जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को गिराने के प्रशासनिक आदेश पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सोमवार, 20 जुलाई को जारी अपने बयान में उन्होंने राज्य सरकार से इस ध्वस्तीकरण आदेश पर तत्काल पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। मदनी ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और राज्य के संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है।
छात्रों के भविष्य और राष्ट्रीय धरोहर का हवाला:
मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि इस तरह के बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण से विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हजारों विद्यार्थियों का शैक्षणिक भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा। इससे न केवल छात्रों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, बल्कि देश का एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थान और राष्ट्रीय संपत्ति भी नष्ट हो जाएगी।
“ध्वस्तीकरण से हजारों छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा। जौहर यूनिवर्सिटी एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संपत्ति है, जिसे बचाना आवश्यक है।” — मौलाना महमूद मदनी, अध्यक्ष (जमीयत उलमा-ए-हिंद)
कानूनी विकल्प: ध्वस्तीकरण ही एकमात्र समाधान नहीं:
मदनी ने कानूनी पहलुओं पर जोर देते हुए कहा कि यदि किसी निर्माण में टाउन प्लानिंग या बिल्डिंग रेगुलेशन के उल्लंघन की पुष्टि होती भी है, तब भी कानून के तहत ध्वस्तीकरण पहला या अनिवार्य उपाय नहीं होता है।
- वैकल्पिक कानूनी समाधान: यदि कोई ढांचा शहर के मास्टर प्लान या स्वीकृत भूमि उपयोग (Land Use) का गंभीर उल्लंघन नहीं करता है, तो प्राधिकरण को संशोधित नक्शा पास करने, कंपाउंडिंग शुल्क (शमन शुल्क) लेने, विकास शुल्क वसूलने या अन्य वैधानिक जुर्माना लगाकर उसे नियमित (Regularise) करने पर विचार करना चाहिए।
- न्यायिक मिसालों का संदर्भ: उन्होंने पूर्व में दिए गए अदालती फैसलों का हवाला दिया, जिसमें कानपुर के रूमा इंडस्ट्रियल एरिया स्थित एक इंजीनियरिंग कॉलेज के अलावा वाराणसी, झांसी और इलाहाबाद विकास प्राधिकरणों से जुड़े मामले शामिल हैं। इन सभी मामलों में अदालतों ने तत्काल ध्वस्तीकरण के बजाय नियमितीकरण और शमन शुल्क जैसे सुधारात्मक उपायों को प्राथमिकता दी थी।
रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) का तर्क है कि आजम खान द्वारा स्थापित इस विश्वविद्यालय की अधिकांश इमारतें बिना अनुमति के बनाई गईं। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना था कि जब इन इमारतों का निर्माण हुआ था, तब संबंधित क्षेत्र आरडीए के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। हालांकि, विकास प्राधिकरण ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
निष्कर्ष:
मौलाना महमूद मदनी ने उत्तर प्रदेश सरकार से अपील की है कि वह छात्रों के हित और राष्ट्रीय शैक्षणिक परिसंपत्ति की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कानून के दायरे में उपलब्ध वैकल्पिक रास्तों को प्राथमिकता दे। इस विवाद में शैक्षणिक संस्थानों के संरक्षण और प्रशासनिक नियमों के अनुपालन के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
डिस्क्लेमर: यह मामला वर्तमान में प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं के अधीन है। मामले में न्यायालयी याचिकाओं या सरकारी आदेशों से संबंधित नए अपडेट आ सकते हैं।
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