IND-PAK: ताशकंद समझौता (Tashkent Agreement) – 1966 क्या है? जानें इसके महत्व और उद्देश्य के बारे में | IND-PAK: What is the Tashkent Agreement – ​​1966? Know about its importance and objective

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IND-PAK: ताशकंद समझौता (Tashkent Agreement) – 1966 क्या है? जानें इसके महत्व और उद्देश्य के बारे में | IND-PAK: What is the Tashkent Agreement – ​​1966? Know about its importance and objective

भारत में आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर छात्रों से ट्रेंडिंग विषयों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। और अभी हाल ही में हुए पहलगाम आंतकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस आंतकी हमले में 28 टूरिस्टों की निर्मम हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है।

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IND-PAK: ताशकंद समझौता (Tashkent Agreement) – 1966 क्या है

जिसका जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंधु जल संधि को रद्द करने का बड़ा निर्णय लिया है। ऐसे में इतिहास में झांकना स्वाभाविक है कि पहले भी ऐसे कौन-कौन से समझौते हुए हैं, जिनका असर भारत-पाक संबंधों पर पड़ा है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण समझौता है – ताशकंद समझौता।

चलिए आज के इस लेख में जानते हैं कि आखिकार ताशकंद समझौता (Tashkent Agreement) – 1966 क्या है? और भारत-पाकिस्तान दोनों के लिए इस समझौते का महत्व क्या है?

ताशकंद समझौता क्या है?

ताशकंद समझौता 10 जनवरी, 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। यह समझौता भारत-पाक युद्ध 1965 के बाद सोवियत संघ (अब उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद) की मध्यस्थता में हुआ था। भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने इसमें भाग लिया था।

इस समझौते का उद्देश्य युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति बहाल करना और विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझाना था।

समझौते की मुख्य बातें

• दोनों देश युद्धविराम की स्थिति को बहाल करेंगे और अपनी सेनाएं 5 अगस्त, 1965 से पूर्व की स्थिति में वापस बुलाएंगे।
• दोनों देश एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
• दोनों देश द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिये आपसी विवादों का समाधान करेंगे।
• राजनयिक संबंधों को फिर से बहाल किया जाएगा।
• दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को सामान्य किया जाएगा।

ताशकंद समझौते का महत्व क्या है?

ताशकंद समझौते ने तत्कालीन समय में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने में मदद की। इसने यह संदेश दिया कि किसी भी समस्या का हल संवाद और कूटनीति के माध्यम से निकाला जा सकता है। हालांकि, यह समझौता लंबे समय तक प्रभावी नहीं रहा और 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध हुआ, जिसके बाद शिमला समझौता हुआ।

ताशकंद समझौते की एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसके एक दिन बाद ही भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु हो गई, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। उनकी मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है, जिससे यह समझौता और भी अधिक ऐतिहासिक बन गया।

वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता

आज जब भारत ने सिंधु जल समझौते को रद्द कर पाकिस्तान को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसाने का फैसला किया है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि ऐसे समझौतों की भूमिका केवल कागजों पर नहीं होती, बल्कि ये दोनों देशों के आपसी संबंधों को प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज होते हैं।

ताशकंद समझौता से हम यह समझ सकते हैं कि भले ही युद्ध के हालात पैदा हो जाएं, लेकिन अंततः समाधान शांति, संवाद और कूटनीति से ही निकलता है।

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