पटना : 15 दिसंबर 2025 को बिहार में आयुष विभाग के अंतर्गत नवनियुक्त 1,283 चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र वितरित किए जा रहे थे। इसी कार्यक्रम में यूनानी चिकित्सा की नव नियुक्त डॉक्टर नुसरत परवीन को भी नियुक्ति पत्र मिला। वह अपने पेशेवर आत्मविश्वास और शालीन व्यक्तित्व के साथ मंच पर खड़ी थीं। उनके हाथ में नियुक्ति पत्र था और सिर पर हिजाब, जो उनके विश्वास और पहचान का हिस्सा है। इसी दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें नियुक्ति पत्र सौंपते हुए अचानक उनका हिजाब खींच दिया। यह क्षण कुछ सेकंड का था, लेकिन उसका प्रभाव गहरा और असहज करने वाला रहा। मंच पर मौजूद लोग हँस पड़े, उपमुख्यमंत्री ने स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन तब तक यह दृश्य सार्वजनिक हो चुका था।
इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो में नुसरत परवीन का आत्मसंयम और पेशेवर गरिमा स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन यह भी साफ दिखता है कि एक महिला का निजी और धार्मिक प्रतीक कैसे एक सार्वजनिक तमाशा बना दिया गया। यह घटना केवल व्यक्तिगत असहजता का मामला नहीं है, बल्कि इसमें लैंगिक संवेदनशीलता, सत्ता का व्यवहार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर सवाल भी जुड़े हुए हैं।
लैंगिक अध्ययन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह घटना सत्ता और पुरुष दृष्टि की उस प्रवृत्ति को दर्शाती है, जिसमें महिलाओं के शरीर, पहनावे और पहचान को नियंत्रित या “खोलकर देखने” की मानसिकता मौजूद रहती है। विद्वानों के अनुसार, सत्ता में बैठे पुरुष अक्सर महिलाओं को रहस्य या वस्तु की तरह देखते हैं, जिसे समझने या उजागर करने का अधिकार वे स्वयं को देते हैं। नुसरत परवीन जैसी शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला के लिए हिजाब कोई बंधन नहीं, बल्कि एक सचेत और व्यक्तिगत चुनाव है, जो उनके पेशेवर और धार्मिक जीवन के बीच संतुलन बनाता है।
धार्मिक दृष्टि से भी यह मामला संवेदनशील है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और उसके अनुसार पहनावा अपनाने की स्वतंत्रता देता है। हिजाब इस्लाम में शालीनता और व्यक्तिगत आस्था का प्रतीक है, जिसे कई महिलाएं अपनी पहचान और सुरक्षा के रूप में अपनाती हैं। इसे जबरन हटाने या उसका मजाक बनाने का कृत्य न केवल व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सवाल खड़े करता है।
हाल के वर्षों में हिजाब को लेकर देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक विवाद सामने आए हैं। कर्नाटक में 2022 के हिजाब विवाद से लेकर अन्य राज्यों में चल रही बहसों तक, यह विषय अक्सर महिलाओं की स्वतंत्रता से अधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बनता रहा है। इस संदर्भ में नुसरत परवीन का मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि किस तरह एक महिला की व्यक्तिगत आस्था को सार्वजनिक बहस और राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया जाता है, जबकि उसके पेशेवर योगदान और उपलब्धियों पर ध्यान पीछे छूट जाता है।
सामाजिक वास्तविकता यह भी है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा आज भी एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि हर साल महिलाओं के खिलाफ लाखों अपराध दर्ज होते हैं। ऐसे में कई महिलाओं के लिए हिजाब या अन्य पारंपरिक पहनावे आत्म-सुरक्षा और आत्मसम्मान का माध्यम भी बन जाते हैं। इसे केवल “दमन” के रूप में देखना, महिलाओं के अनुभवों और विकल्पों की जटिलता को नज़रअंदाज़ करना है।
इस घटना पर मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इसे “मजाकिया व्यवहार” बताया गया, लेकिन सार्वजनिक प्रतिक्रिया ने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता में बैठे व्यक्ति का ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं हो सकता। उम्र या स्वास्थ्य का हवाला देकर भी इस कृत्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि सत्ता के साथ जिम्मेदारी और संवेदनशीलता भी जुड़ी होती है।
नुसरत परवीन का यह क्षण केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक बहस को सामने लाता है जिसमें लैंगिक सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा होती है। किसी भी महिला की पहचान, उसका पहनावा और उसका विश्वास उसकी निजी पसंद है। सच्ची स्वतंत्रता और समानता तभी संभव है, जब समाज और सत्ता दोनों इस पसंद का सम्मान करें और महिलाओं को प्रतीक नहीं, बल्कि एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखें।



