केंद्र सरकार ने 3 दिसंबर 2025 को ‘संचार साथी’ ऐप को हर स्मार्टफोन में जबरदस्ती प्री-इंस्टॉल करने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। सरकार का यह फैसला गोपनीयता को लेकर उठी भारी नाराज़गी और विपक्ष, तकनीकी विशेषज्ञों, नागरिक अधिकार समूहों और उद्योग संगठनों की कड़ी आलोचना के बाद आया। दूरसंचार विभाग ने 28 नवंबर को यह आदेश दिया था कि सभी मोबाइल कंपनियां नए फोन के साथ-साथ पुराने फोन में भी सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए यह ऐप अनिवार्य रूप से डालें और उपयोगकर्ता इसे न तो हटाएं और न ही डिसेबल करें। 2023 में शुरू हुआ यह ऐप IMEI नंबर की जांच, चोरी या गुम हुए फोन को ब्लॉक करने, संदिग्ध कनेक्शन पहचानने और ऑनलाइन धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसे अनिवार्य करने पर लोगों ने गंभीर आपत्ति जताई। आलोचकों का कहना था कि किसी फोन में सरकार का ऐसा ऐप जबरन डालना और उसे हटाने की अनुमति न देना लोगों की निजता और अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है और इसका दुरुपयोग भी संभव है। बढ़ते विरोध के बीच संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सफाई देते हुए कहा कि यह ऐप पूरी तरह वैकल्पिक रहेगा, लोग चाहें तो इसे फोन से हटा भी सकेंगे और सरकार की किसी तरह की निगरानी करने की कोई योजना नहीं है। लगातार दबाव के बाद मंत्रालय ने कहा कि पहले से ही 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग इस ऐप को स्वेच्छा से डाउनलोड कर चुके हैं, इसलिए अब इसे अनिवार्य बनाने की जरूरत नहीं है। ICEA जैसे उद्योग संगठनों ने सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि साइबर सुरक्षा मजबूत करने का सही तरीका पारदर्शिता, उपयोगकर्ता की सहमति और उनकी पसंद का सम्मान करना है, न कि किसी ऐप को जबरदस्ती थोपना। हालांकि गोपनीयता से जुड़े कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि लोगों के निजी उपकरणों पर किसी भी तरह के सरकारी ऐप को अनिवार्य करने से पहले गोपनीयता और डेटा सुरक्षा की ठोस कानूनी गारंटी होना बेहद जरूरी है।
सरकार ने ‘संचार साथी’ ऐप को अनिवार्य करने का आदेश वापस लिया
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