Rupees Fall: Rs 1 = $1 से गिरकर अब प्रति डॉलर का भाव 90 रुपये के हुआ पार, जानें कैसा रुपये का सफर | EXPLAINER | Rupees Fall From Rs 1 = 1 Dollar Indian Rupees Value Crossed 90 per USD Know Journey Of Rupees

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Rupees Fall: Rs 1 = $1 से गिरकर अब प्रति डॉलर का भाव 90 रुपये के हुआ पार, जानें कैसा रुपये का सफर | EXPLAINER | Rupees Fall From Rs 1 = 1 Dollar Indian Rupees Value Crossed 90 per USD Know Journey Of Rupees

Rupees Fall; Journey Of Rupee : वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर कई तरह के बदलाव के बीच भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी देखी जा रही है। बेशक भारतीय अर्थव्यवस्था की गति तेज बनी हुई है और बाकी देशों के मुकाबले GDP ग्रोथ रेट सबसे तेज गति से बढ़ रही है। वहीं, डॉल के मुकाबले रुपये के भाव में लगातार गिरावट चिंता का सबब बना हुआ है।

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Rupees Vs Dollar

एक समय में 1 रुपये की वैल्यू 1 डॉलर या उससे कहीं अधिक थी जो अब गिरते हुए इतिहास में पहली बार 1 डॉलर की वैल्यू अब 90 रुपये से अधिक हो गई है। तो चलिए यहां समझने की कोशिश करते हैं कि रुपये में गिरावट के क्या-क्या प्रमुख कारण हैं… 1 डॉलर की बराबरी से लेकर अब तक रुपये का सफर कैसा रहा है और सबसे बड़ा सवाल के रुपये में गिरावट का असर आम लोगों पर क्या होगा…

आजादी से अब तक रुपये में उतार-चढ़ाव

भारतीय रुपये की कहानी भारत की आर्थिक यात्रा का आईना है। भारत के आजादी का समय यानी 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले मजबूत थी, लेकिन समय के साथ वैश्विक और घरेलू चुनौतियों ने इसे कमजोर किया।

बुधवार 3 दिसंबर, 2025 को इतिहास में पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की वैल्यू 90 के पार चली गई। इसके बाद गुरुवार को यह 90.4 रुपये के नए निचले स्तर पर पहुंच गई। यह गिरावट ट्रेड टेंशन, विदेशी निवेश की निकासी और डॉलर की मजबूती जैसे कारकों के चलते देखने को मिली है।

आजादी के बाद का दौर में रुपये की हालत: स्थिरता से अस्थिरता की ओर (1947-1991)

  • 1947: आजादी के समय, 1 डॉलर लगभग 1 रुपये या थोड़ा ज्यादा (कई रिपोर्ट्स के अनुसार 3.30 रुपये) के बराबर था। तब देश पर बहुत ज्यादा कोई बाहरी कर्ज नहीं था, इसलिए रुपये की स्थिति मजबूत थी। ब्रिटिश काल में रुपया पाउंड से जुड़ा था, जो डॉलर से अप्रत्यक्ष रूप से लिंक्ड था।
  • 1950-1960: फिक्स्ड एक्सचेंज रेट सिस्टम के तहत स्थिरता बनी रही। 1966 में आर्थिक संकट (सूखा, युद्ध खर्च) के कारण पहली बड़ा डिवैल्यूएशन हुआ और 1 डॉलर = 7.50 रुपये हो गया।
  • 1970-1980: तेल संकट और मुद्रास्फीति ने दबाव बढ़ाया। 1985 तक यह प्रति डॉलर 12-13 रुपये तक पहुंचा।
  • 1991: आर्थिक संकट के चरम पर लाइसेंस राज खत्म हुआ। रुपये को 19% डिवैल्यू किया गया। इसके बाद 1 डॉलर = 22.74 रुपये का हो गया। यह उदारीकरण का दौर था, जब रुपये को बाजार के हवाले कर दिया गया।

इस दौर में रुपये की गिरावट मुख्य रूप से आयात निर्भरता, कम निर्यात और सरकारी नियंत्रण से हुई।

उदारीकरण के बाद रुपये की वैल्यू: तेजी से गिरावट (1991-2025)

  • 1990 के दशक: वैश्वीकरण से विदेशी निवेश आया, लेकिन एशियन फाइनेंशियल क्राइसिस (1997) ने दबाव डाला। 2000 तक 1 डॉलर = 45 रुपये हो गया।
  • 2000-2010: आईटी बूम और विकास से स्थिरता आई, लेकिन 2008 ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस ने इसे 50 रुपये तक पहुंचा दिया।
  • 2010-2020: तेल कीमतें, व्यापार घाटा और मुद्रास्फीति ने प्रभावित किया। इससे 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ में यह 68 रुपये तक गिर गया। 2020 में कोविड काल में रुपया और कमजोर हुआ और प्रति डॉलर 76 रुपये तक पहुंच गया।
  • 2021-2024: रिकवरी के बावजूद, यह 83-85 रुपये के आसपास रहा। जनवरी 2025 में यह 86 रुपये के करीब था।
  • 2025: साल भर में 5% से ज्यादा की गिरावट देखी गई। दिसंबर 2025 में यह 89.94 से टूटकर 90.43 रुपये तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। आरबीआई ने हस्तक्षेप किया, लेकिन डॉलर की मजबूती ने इसे रोकना मुश्किल कर दिया।

रुपये की गिरावट के प्रमुख कारण

रुपये की कमजोरी बहुआयामी है, लेकिन 2025 में ये कारक प्रमुख रहे हैं।

  • अमेरिका के साथ व्यापार तनाव: अप्रैल 2025 से अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर 50% तक टैरिफ लगाए, जिससे निर्यात प्रभावित हुए। व्यापार समझौते में देरी ने अनिश्चितता बढ़ाई।
  • विदेशी निवेश की निकासी: 2025 में FPIs ने भारतीय शेयरों से $17 अरब निकाले। अमेरिकी ब्याज दरें ऊंची रहने से डॉलर आकर्षक बना।
  • व्यापार घाटा और आयात निर्भरता: तेल और कमोडिटी की ऊंची कीमतें आयात बिल बढ़ा रही हैं। भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ा, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी।
  • मुद्रास्फीति और वैश्विक कारक: भारत में मुद्रास्फीति अमेरिका से ज्यादा रही। जियोपॉलिटिकल टेंशन (जैसे क्षेत्रीय संघर्ष) ने डॉलर को सेफ-हेवन बनाया।
  • आरबीआई की नीति: सेंट्रल बैंक ने रिजर्व ($690 अरब) का इस्तेमाल किया, लेकिन अब लॉन्ग-टर्म रेजिलिएंस पर फोकस कर रहा है, न कि हर स्तर की रक्षा पर।

ये कारक रुपये को एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना रहे हैं।

चार्ट में देखें रुपये का सफर: प्रमुख वर्षों में 1 डॉलर = कितने रुपये?

नीचे दिए गए चार्ट में आजादी से 2025 तक के प्रमुख बिंदुओं पर रुपये की कीमत दिखाई गई है। यह लाइन चार्ट रुपये की लंबी अवधि की गिरावट को स्पष्ट करता है।

Rupees Vs Dollar

रुपये में गिरावट का आम आदमी पर क्या असर?

नकारात्मक: विदेश यात्रा, पढ़ाई (विदेश में $1 का खर्च ₹90+), पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान महंगे होंगे। मुद्रास्फीति यानी महंगाई बढ़ सकती है।

सकारात्मक: निर्यातक (आईटी, टेक्सटाइल) और रेमिटेंस पाने वाले परिवारों को फायदा होगा। रुपये की कमजोरी निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाती है।

भविष्य: एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2026 में यह 92-95 रुपये तक जा सकता है, लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के हस्तक्षेप और ट्रेड डील्स से स्थिरता आ सकती है।

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