Mohan Bhagwat ने बताया धर्म से शासन चलाने और संविधान से देश चलाने में क्या है फर्क? कही बड़ी बात | rss chief Mohan Bhagwat explained difference between governing country by religion and Constitution hindi

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India

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oi-Smita Mugdha


Mohan
Bhagwat
News:

राष्ट्रीय
स्वयंसेवक
संघ
(RSS)
के
सरसंघचालक
मोहन
भागवत
इन
दिनों
देश-दुनिया
के
कई
शहरों
में
व्याख्यान
दे
रहे
हैं।
यह
साल
संघ
के
स्थापना
का
शताब्दी
वर्ष
है,
तो
दुनिया
भर
में
विशेष
कार्यक्रम
आयोजित
किए
गए
हैं।
हरियाणा
के
पानीपत
में
आयोजित
‘भारतीय
इतिहास,
संस्कृति
और
संविधान’
कार्यक्रम
में
उन्होंने
संविधान
लागू
किए
जाने
की
जरूरत
पर
बात
की।
इस
दौरान
उन्होंने
कहा
कि
देश
पहले
संविधान
से
नहीं
बल्कि
धर्म
से
चलता
था।

आरएसएस
चीफ
मोहन
भागवत
ने
इस
दौरान
कहा
कि
आज
देश
संविधान
के
आधार
पर
चलता
है।
इसके
बावजूद
लोगों
के
मन
में
अक्सर
यह
सवाल
आता
है
कि
जब
संविधान
अस्तित्व
में
नहीं
था,
तब
शासन
की
प्रक्रिया
कैसे
संचालित
होती
थी।
उन्होंने
बताया
कि
प्राचीन
समय
में
देश
का
संचालन
‘धर्म’
के
सिद्धांतों
पर
आधारित
था।

Mohan Bhagwat News

Mohan
Bhagwat
ने
बताया
धर्म
शासन
का
अर्थ

आरएसएस
चीफ
ने
इस
दौरान
कहा
कि
यहां
धर्म
का
अर्थ
किसी
विशेष
रिलिजन
से
नहीं,
बल्कि
कर्तव्य,
नैतिकता
और
आचरण
से
है।
उन्होंने
धर्म
से
शासन
चलने
वाले
दौर
की
बात
करते
हुए
कहा
कि
उस
दौर
में
लोग
पथभ्रष्ट
नहीं
होते
थे
और
समाज
एक-दूसरे
को
उन्नत
बनाने
के
सिद्धांत
पर
चलता
था।
समाज
की
समृद्धि
को
केंद्र
में
रखकर
शासन
किया
जाता
था।
संघ
प्रमुख
ने
संविधान
के
अस्तित्व
में
आने
का
जिक्र
करते
हुए
कहा,
‘समय
के
साथ
परिस्थितियाx
बदलीं
और
लोगों
को
राजा
की
आवश्यकता
महसूस
हुई।
इस
जरूरत
को
देखते
हुए
एक
नई
शासन
प्रणाली
की
शुरुआत
हुई।’


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साल
से
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हमेशा
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करते
रहेंगे’,
औवेसी
ने
RSS
पर
साधा
निशाना

RSS
Chief
ने
बताया,
‘शासन
की
व्यवस्था
में
कैसे
आया
संविधान’

मोहन
भागवत
के
अनुसार,
जब
राजा
आया
तो
उसके
सामने
यह
चुनौती
थी
कि
वह
शासन
कैसे
संचालित
करे।
इसी
प्रश्न
से
विधि
व्यवस्था
का
उद्भव
हुआ।
आगे
चलकर
समाज
और
राज्य
संचालन
से
जुड़े
नियमों
के
संकलन
को
संविधान
का
रूप
दिया
गया।
अब
संविधान
के
आधार
पर
यह
तय
किया
जाता
है
कि
नागरिकों
के
अधिकारों
और
हितों
की
रक्षा
हो।
यह
शासन
की
प्रक्रिया
सुचारू
रूप
से
चलाने
के
लिए
जरूरी
है।
इस
कार्यक्रम
में
भागवत
ने
कहा
कि
संविधान
के
जरिए
यह
तय
होता
है
कि
किसी
भी
वर्ग
या
व्यक्ति
के
हितों
की
अनदेखी

हो।


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